Kikis कोई पाठ्यपुस्तक नहीं है

उनके लिए जो मूल बातें जानते हैं, पर 'निरंतरता' कभी नहीं मिल पाई।

वर्णमाला भी आती है, बुनियादी व्याकरण भी। फिर भी स्तर नहीं बढ़ा — वजह प्रतिभा नहीं, समय था। ऐसी ज़िंदगी जो निरंतरता की इजाज़त नहीं देती थी।

इसलिए Kikis अलग तरह से शुरू करता है। भाषा अनंत है, पर आप जो शब्द और ढाँचे इस्तेमाल करते हैं वे लगभग तय हैं — किसी भी भाषा में। Kikis आपकी अभिव्यक्तियाँ जुटाता है और भूलने से ठीक पहले उन्हें चुपचाप जगा देता है। गहरा रटना नहीं — भूलने से ऐन पहले फिर मिलना।

और रोज़ के लेखों, छोटी मेज़ों और बातचीत के ज़रिए आपको वे नए शब्द खोजने देता है जो आपको खींचते हैं। जब तक आपके शब्द आपकी नई भाषा न बन जाएँ।

यही तरीक़ा क्यों

95%

रोज़मर्रा की बातचीत का लगभग 95% सबसे आम 2,000 शब्दों के भीतर होता है। (अंग्रेज़ी बोलचाल कॉर्पस, Adolphs & Schmitt 2003)

16,000

मातृभाषी 40,000+ शब्द जानते हैं, पर दिन में बोलते हैं केवल ~16,000 — यानी वही कुछ हज़ार शब्द बार-बार। (Brysbaert 2016 · Mehl 2007, Science)

58.6%

हम जो कहते हैं उसका आधे से ज़्यादा मौक़े पर गढ़ा नहीं जाता — वे पहले से जमे हुए वाक्यांश और ढाँचे होते हैं। (Erman & Warren 2000)

स्रोत

  • Adolphs, S. & Schmitt, N. (2003). Lexical Coverage of Spoken Discourse. Applied Linguistics 24(4).
  • Brysbaert, M., Stevens, M., Mandera, P. & Keuleers, E. (2016). How Many Words Do We Know? Frontiers in Psychology 7:1116.
  • Mehl, M. R. et al. (2007). Are Women Really More Talkative Than Men? Science 317(5834).
  • Erman, B. & Warren, B. (2000). The idiom principle and the open choice principle. Text 20(1).